सूरह अल-मुल्क (سورة الملك) – अरबी पाठ हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू अर्थ के साथ
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सूरह अल-मुल्क (سورة الملك) – अरबी मतन और हिंदी तर्जुमा
सूरह अल-मुल्क क़ुरआन-ए-पाक की 67वीं सूरह है। इसमें 30 आयतें हैं और यह 29वें पारे (तबारकल्लज़ी) में आती है। "अल-मुल्क" का मतलब है "बादशाही" या "हुकूमत", क्योंकि इसकी शुरुआत ही इस बात से होती है कि पूरी कायनात का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है। इसे सूरह तबारक, अल-वाक़ियह (बचाने वाली), अल-मुनजियह (नजात देने वाली) और अल-माने'अह (रोकने वाली) भी कहा जाता है। इस पेज पर आप सूरह अल-मुल्क का पूरा अरबी मतन आसान हिंदी तर्जुमे के साथ पढ़ सकते हैं, और जान सकते हैं कि यह क्यों नाज़िल हुई और मुसलमान इसे हर रात क्यों पढ़ते हैं।
सूरह अल-मुल्क की ज़रूरी मालूमात (Quick Facts)
- सूरह का नंबर: 67
- कुल आयतें: 30
- नुज़ूल की जगह: मक्का मुकर्रमा (मक्की सूरह)
- पारा: 29
- रुकूअ: 2
- अहम मौज़ूआत: अल्लाह की क़ुदरत, मौत और ज़िंदगी एक आज़माइश, आसमान की निशानियाँ, आख़िरत, शुक्र, अल्लाह पर तवक्कुल
सूरह अल-मुल्क क्यों नाज़िल हुई? पस-मंज़र और तारीख़
सूरह अल-मुल्क मक्का मुकर्रमा में नाज़िल हुई, जब नबी करीम ﷺ की दावत का इब्तिदाई और दरमियानी दौर था। उस वक़्त क़ुरैश के ज़्यादातर लोग बुतों की पूजा करते थे, मरने के बाद दोबारा ज़िंदा होने का इनकार करते थे, नबी ﷺ का मज़ाक़ उड़ाते थे और बार-बार पूछते थे कि क़यामत का वादा कब पूरा होगा?
उन्हें अपनी तिजारत, दौलत और क़बीले की ताक़त पर नाज़ था, और वे समझते थे कि कोई ताक़त उन्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। यह सूरह उनके दिलों को जगाने और उनके सवालों का जवाब देने के लिए नाज़िल हुई।
- यह याद दिलाती है कि सारी बादशाही और ताक़त सिर्फ़ अल्लाह की है, बुतों या दौलतमंद सरदारों की नहीं।
- यह आसमान, परिंदों, ज़मीन और पानी को देखने और सोचने की दावत देती है कि इन सबको कौन संभाल रहा है।
- यह जहन्नम के अज़ाब से ख़बरदार करती है और पिछली क़ौमों की मिसाल देती है जिन्होंने अपने रसूलों को झुठलाया।
- जो लोग बिना देखे अल्लाह से डरते हैं, उन्हें बख़्शिश और बड़े अज्र की ख़ुशख़बरी देती है।
- नबी ﷺ को हुक्म देती है कि मज़ाक़ उड़ाने वालों को सीधा जवाब दें: क़यामत का इल्म अल्लाह के पास है और मैं तो सिर्फ़ खुला डराने वाला हूँ।
इस सूरह के पीछे कोई एक ख़ास वाक़िआ नहीं है। यह अहल-ए-मक्का के लिए एक आम नसीहत के तौर पर नाज़िल हुई, और इसका पैग़ाम आज हमारे लिए भी उतना ही अहम है।
सूरह अल-मुल्क की फ़ज़ीलत और फ़ायदे
- नबी ﷺ ने फ़रमाया कि क़ुरआन में तीस आयतों की एक सूरह है जो अपने पढ़ने वाले की सिफ़ारिश करती रहेगी यहाँ तक कि उसे बख़्श दिया जाए, और वह सूरह तबारक है (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)।
- हज़रत जाबिर रज़ि. से रिवायत है कि नबी ﷺ सूरह अस-सजदह और सूरह अल-मुल्क पढ़े बग़ैर नहीं सोते थे (तिर्मिज़ी)।
- बहुत से उलमा और रिवायात के मुताबिक़ यह सूरह पढ़ने और उस पर अमल करने वाले को क़ब्र के अज़ाब से बचाती है।
- रोज़ाना पढ़ने से ग़ौर-ओ-फ़िक्र, शुक्र और अल्लाह के ख़ौफ़ की आदत बनती है।
नोट: असल फ़ायदा क़ुरआन को पढ़ने, समझने और उस पर अमल करने से है। ख़ास तौर पर सोने से पहले पढ़ना एक ख़ूबसूरत सुन्नत अमल है।
आज की नस्ल (Generation) के लिए सूरह अल-मुल्क के अहम सबक़
- ज़िंदगी एक इम्तिहान है। अल्लाह ने मौत और ज़िंदगी इसलिए पैदा की कि देखे किसके अमल सबसे अच्छे हैं, यह नहीं कि किसके पास ज़्यादा है।
- कायनात पर ग़ौर करें। आसमान में कोई ख़राबी या दरार नहीं। ईमानदारी से सोचें तो Science और ईमान एक-दूसरे के साथ चलते हैं।
- तन्हाई में भी नेक रहें। अल्लाह दिलों के राज़ जानता है, हमारे छुपे ख़यालात और Online बर्ताव भी।
- रिज़्क़ अल्लाह के हाथ में है। मेहनत ज़रूर करें, मगर याद रखें कि रिज़्क़ देने वाला वही है।
- शुक्रगुज़ार बनें। कान, आँखें और दिल अल्लाह की नेमतें हैं। इन्हें हक़ सुनने, निशानियाँ देखने और समझने के लिए इस्तेमाल करें।
- अमन-ओ-सलामती को मामूली न समझें। ज़मीन, पानी और मौसम सब उसी के क़ाबू में हैं।
- अल्लाह पर भरोसा रखें। मोमिन कहते हैं: "हम उस पर ईमान लाए और उसी पर तवक्कुल किया।"
सूरह अल-मुल्क रोज़ाना कैसे पढ़ें?
- नमाज़-ए-इशा के बाद या सोने से पहले पढ़ें।
- अपनी ज़बान में तर्जुमा भी पढ़ें ताकि दिल अल्फ़ाज़ से जुड़ सके।
- अगर ज़बानी याद न हो तो मुसहफ़ या इस पेज से देखकर पढ़ें।
- हर रोज़ एक आयत पर ग़ौर करें और उस पर अमल की कोशिश करें।
सूरह अल-मुल्क का पूरा अरबी मतन और हिंदी तर्जुमा
आयत 1
تَبَارَكَ الَّذِي بِيَدِهِ الْمُلْكُ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
हिंदी: बड़ी बरकत वाला है वह जिसके हाथ में बादशाही है, और वह हर चीज़ पर पूरी क़ुदरत रखता है।
आयत 2
الَّذِي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيَاةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْغَفُورُ
हिंदी: जिसने मौत और ज़िंदगी को पैदा किया ताकि तुम्हें आज़माए कि तुममें अमल के लिहाज़ से कौन सबसे अच्छा है; और वह ग़ालिब, बख़्शने वाला है।
आयत 3
الَّذِي خَلَقَ سَبْعَ سَمَاوَاتٍ طِبَاقًا ۖ مَّا تَرَىٰ فِي خَلْقِ الرَّحْمَٰنِ مِن تَفَاوُتٍ ۖ فَارْجِعِ الْبَصَرَ هَلْ تَرَىٰ مِن فُطُورٍ
हिंदी: जिसने सात आसमान तह-ब-तह बनाए। तुम रहमान की बनावट में कोई कमी नहीं देखोगे। फिर नज़र दौड़ाओ, क्या कोई दरार नज़र आती है?
आयत 4
ثُمَّ ارْجِعِ الْبَصَرَ كَرَّتَيْنِ يَنقَلِبْ إِلَيْكَ الْبَصَرُ خَاسِئًا وَهُوَ حَسِيرٌ
हिंदी: फिर बार-बार नज़र दौड़ाओ, तुम्हारी निगाह थककर नाकाम होकर तुम्हारी तरफ़ लौट आएगी।
आयत 5
وَلَقَدْ زَيَّنَّا السَّمَاءَ الدُّنْيَا بِمَصَابِيحَ وَجَعَلْنَاهَا رُجُومًا لِّلشَّيَاطِينِ ۖ وَأَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابَ السَّعِيرِ
हिंदी: और हमने क़रीब वाले आसमान को चिराग़ों (सितारों) से सजाया, और उन्हें शैतानों को मारने का ज़रिया बनाया, और उनके लिए भड़कती आग का अज़ाब तैयार किया।
आयत 6
وَلِلَّذِينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
हिंदी: और जिन्होंने अपने रब का इनकार किया उनके लिए जहन्नम का अज़ाब है, और वह बहुत बुरा ठिकाना है।
आयत 7
إِذَا أُلْقُوا فِيهَا سَمِعُوا لَهَا شَهِيقًا وَهِيَ تَفُورُ
हिंदी: जब वे उसमें डाले जाएँगे तो उसकी दहाड़ सुनेंगे, और वह जोश मार रही होगी।
आयत 8
تَكَادُ تَمَيَّزُ مِنَ الْغَيْظِ ۖ كُلَّمَا أُلْقِيَ فِيهَا فَوْجٌ سَأَلَهُمْ خَزَنَتُهَا أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَذِيرٌ
हिंदी: ऐसा लगेगा कि ग़ुस्से से फट पड़ेगी। जब भी कोई गिरोह उसमें डाला जाएगा, उसके निगहबान पूछेंगे: "क्या तुम्हारे पास कोई डराने वाला नहीं आया था?"
आयत 9
قَالُوا بَلَىٰ قَدْ جَاءَنَا نَذِيرٌ فَكَذَّبْنَا وَقُلْنَا مَا نَزَّلَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِي ضَلَالٍ كَبِيرٍ
हिंदी: वे कहेंगे: "हाँ, हमारे पास डराने वाला आया था, मगर हमने झुठला दिया और कहा कि अल्लाह ने कुछ नहीं उतारा, तुम तो बड़ी गुमराही में हो।"
आयत 10
وَقَالُوا لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ أَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا فِي أَصْحَابِ السَّعِيرِ
हिंदी: और कहेंगे: "काश हम सुनते या समझते तो भड़कती आग वालों में न होते।"
आयत 11
فَاعْتَرَفُوا بِذَنبِهِمْ فَسُحْقًا لِّأَصْحَابِ السَّعِيرِ
हिंदी: फिर वे अपने गुनाह का इक़रार करेंगे। तो (रहमत से) दूर हों भड़कती आग वाले।
आयत 12
إِنَّ الَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِالْغَيْبِ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ
हिंदी: जो लोग बिना देखे अपने रब से डरते हैं, उनके लिए बख़्शिश और बड़ा अज्र है।
आयत 13
وَأَسِرُّوا قَوْلَكُمْ أَوِ اجْهَرُوا بِهِ ۖ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
हिंदी: तुम अपनी बात छुपाकर कहो या ज़ोर से, वह तो दिलों के भेद जानता है।
आयत 14
أَلَا يَعْلَمُ مَنْ خَلَقَ وَهُوَ اللَّطِيفُ الْخَبِيرُ
हिंदी: क्या वह न जानेगा जिसने पैदा किया? वह बारीक-बीं और पूरी ख़बर रखने वाला है।
आयत 15
هُوَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ ذَلُولًا فَامْشُوا فِي مَنَاكِبِهَا وَكُلُوا مِن رِّزْقِهِ ۖ وَإِلَيْهِ النُّشُورُ
हिंदी: वही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को आसान बना दिया, तो उसके रास्तों पर चलो और उसका दिया रिज़्क़ खाओ, और उसी की तरफ़ दोबारा उठकर जाना है।
आयत 16
أَأَمِنتُم مَّن فِي السَّمَاءِ أَن يَخْسِفَ بِكُمُ الْأَرْضَ فَإِذَا هِيَ تَمُورُ
हिंदी: क्या तुम उससे बेख़ौफ़ हो गए जो आसमान में है कि वह तुम्हें ज़मीन में धँसा दे और वह अचानक काँपने लगे?
आयत 17
أَمْ أَمِنتُم مَّن فِي السَّمَاءِ أَن يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ كَيْفَ نَذِيرِ
हिंदी: या तुम बेख़ौफ़ हो कि वह तुम पर पत्थर बरसाने वाली आँधी भेज दे? तब तुम जान लोगे कि मेरा डराना कैसा था।
आयत 18
وَلَقَدْ كَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ
हिंदी: इनसे पहले के लोगों ने भी झुठलाया था, फिर देखो मेरी पकड़ कैसी थी!
आयत 19
أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَى الطَّيْرِ فَوْقَهُمْ صَافَّاتٍ وَيَقْبِضْنَ ۚ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا الرَّحْمَٰنُ ۚ إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ بَصِيرٌ
हिंदी: क्या उन्होंने अपने ऊपर परिंदों को नहीं देखा जो पर फैलाते और समेटते हैं? उन्हें रहमान के सिवा कोई नहीं थामता। बेशक वह हर चीज़ को देखने वाला है।
आयत 20
أَمَّنْ هَٰذَا الَّذِي هُوَ جُندٌ لَّكُمْ يَنصُرُكُم مِّن دُونِ الرَّحْمَٰنِ ۚ إِنِ الْكَافِرُونَ إِلَّا فِي غُرُورٍ
हिंदी: भला वह कौन है जो तुम्हारा लश्कर बनकर रहमान के मुक़ाबले में तुम्हारी मदद करे? काफ़िर तो बस धोखे में पड़े हैं।
आयत 21
أَمَّنْ هَٰذَا الَّذِي يَرْزُقُكُمْ إِنْ أَمْسَكَ رِزْقَهُ ۚ بَل لَّجُّوا فِي عُتُوٍّ وَنُفُورٍ
हिंदी: या वह कौन है जो तुम्हें रिज़्क़ दे अगर वह अपना रिज़्क़ रोक ले? बल्कि वे सरकशी और नफ़रत में अड़े हुए हैं।
आयत 22
أَفَمَن يَمْشِي مُكِبًّا عَلَىٰ وَجْهِهِ أَهْدَىٰ أَمَّن يَمْشِي سَوِيًّا عَلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
हिंदी: भला जो मुँह के बल औंधा चलता है वह ज़्यादा सही राह पर है, या वह जो सीधा होकर सीधे रास्ते पर चलता है?
आयत 23
قُلْ هُوَ الَّذِي أَنشَأَكُمْ وَجَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةَ ۖ قَلِيلًا مَّا تَشْكُرُونَ
हिंदी: कहो: "वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें कान, आँखें और दिल दिए। तुम बहुत कम शुक्र करते हो।"
आयत 24
قُلْ هُوَ الَّذِي ذَرَأَكُمْ فِي الْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
हिंदी: कहो: "उसी ने तुम्हें ज़मीन में फैलाया, और उसी के पास तुम इकट्ठे किए जाओगे।"
आयत 25
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
हिंदी: और वे कहते हैं: "यह वादा कब पूरा होगा, अगर तुम सच्चे हो?"
आयत 26
قُلْ إِنَّمَا الْعِلْمُ عِندَ اللَّهِ وَإِنَّمَا أَنَا نَذِيرٌ مُّبِينٌ
हिंदी: कहो: "इसका इल्म तो बस अल्लाह के पास है, और मैं तो सिर्फ़ खुला डराने वाला हूँ।"
आयत 27
فَلَمَّا رَأَوْهُ زُلْفَةً سِيئَتْ وُجُوهُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَقِيلَ هَٰذَا الَّذِي كُنتُم بِهِ تَدَّعُونَ
हिंदी: फिर जब वे उसे क़रीब देखेंगे तो काफ़िरों के चेहरे बिगड़ जाएँगे, और कहा जाएगा: "यही है जिसे तुम माँगा करते थे।"
आयत 28
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَهْلَكَنِيَ اللَّهُ وَمَن مَّعِيَ أَوْ رَحِمَنَا فَمَن يُجِيرُ الْكَافِرِينَ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ
हिंदी: कहो: "बताओ, अगर अल्लाह मुझे और मेरे साथियों को हलाक कर दे या हम पर रहम करे, तो काफ़िरों को दर्दनाक अज़ाब से कौन बचाएगा?"
आयत 29
قُلْ هُوَ الرَّحْمَٰنُ آمَنَّا بِهِ وَعَلَيْهِ تَوَكَّلْنَا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
हिंदी: कहो: "वह रहमान है, हम उस पर ईमान लाए और उसी पर भरोसा किया। जल्द ही तुम जान लोगे कि खुली गुमराही में कौन है।"
आयत 30
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَصْبَحَ مَاؤُكُمْ غَوْرًا فَمَن يَأْتِيكُم بِمَاءٍ مَّعِينٍ
हिंदी: कहो: "बताओ, अगर तुम्हारा पानी ज़मीन में उतर जाए तो कौन है जो तुम्हें बहता हुआ पानी ला दे?"
सूरह अल-मुल्क के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या सूरह अल-मुल्क मक्की है या मदनी?
सूरह अल-मुल्क मक्की सूरह है, यानी हिजरत से पहले मक्का मुकर्रमा में नाज़िल हुई।
सूरह अल-मुल्क में कितनी आयतें हैं?
इसमें 30 आयतें हैं और यह क़ुरआन की 67वीं सूरह है।
सूरह अल-मुल्क कब पढ़नी चाहिए?
ज़्यादातर मुसलमान नबी ﷺ की सुन्नत पर अमल करते हुए इसे हर रात सोने से पहले पढ़ते हैं। आप इसे दिन के किसी भी वक़्त पढ़ सकते हैं।
"मुल्क" का क्या मतलब है?
"मुल्क" का मतलब है बादशाही, हुकूमत या इक़्तिदार। यह सूरह सिखाती है कि हर चीज़ पर हक़ीक़ी इख़्तियार सिर्फ़ अल्लाह का है।
ख़ुलासा (Conclusion)
सूरह अल-मुल्क छोटी सी सूरह है मगर इसका पैग़ाम बहुत बड़ा है: अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है, ज़िंदगी एक इम्तिहान है, और हर इंसान को उसी की तरफ़ लौटना है। इसे रोज़ाना पढ़ें, इसका मतलब समझें और अपने अमल में इससे रहनुमाई लें। अल्लाह हमें क़ुरआन पढ़ने, समझने और उस पर अमल करने वालों में शामिल फ़रमाए। आमीन।
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